भोपाल रिपोर्टर एम तोमर,

भोपाल, नवनियुक्त पदाधिकारी पिछले 3 चुनावों यानि 10 से 15 सालों में अपने गांव, वार्ड में पार्टी प्रत्याशियों को नहीं जिता पाएं हो, क्षेत्र में उनके जनाधार का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। जो नेता खुद कभी एक भी विधानसभा का चुनाव नहीं जीत पाएं हो या अपने गृह क्षेत्र/वार्ड से पार्टी के किसी भी प्रत्याशी को नहीं जिता पाएं हो, ऐसे पदाधिकारियों के भरोसे 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी करना पार्टी के जमीनी, ईमानदार, निष्ठावान कार्यकर्ताओं और प्रदेश के करोड़ों मतदाताओं के साथ मजाक नहीं तो और क्या है।

हालांकि 29 अक्टूबर मंगलवार रात कार्यकारिणी की दूसरी सूची जारी कर डैमेज कंट्रोल करने का प्रयास किया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और कार्यकर्ताओं, नेताओं का गुस्सा फूटकर सार्वजनिक हो चुका था।

सोशल मीडिया पर कार्यकारिणी को लेकर तरह-तरह के कमेंट्स:-

गौरतलब है कि करीब 10 माह लंबे इंतजार के बाद मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष श्रीमान जितेंद्र उर्फ जीतू पटवारी की प्रदेश कार्यकारिणी की पहली सूची 26 अक्टूबर शनिवार को घोषित हुई थी। कार्यकारिणी की सूची सोशल, डिजिटल और प्रिंट मीडिया में जारी होते ही पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूट पड़ा। सोशल मीडिया पर कार्यकारिणी को लेकर तरह-तरह के कमेंट्स कर जमीनी कार्यकर्ता अपनी नाराजगी का इजहार कर रहे है। जमीनी कार्यकर्ताओं की नाराजगी इस बात को लेकर है कि वर्ष 2023 विधानसभा चुनाव में जिन लोगों को पार्टी ने टिकिट दिए, उनमें से ही अधिकांश नेताओं को कार्यकारिणी की पहली सूची में पदाधिकारी बनाया गया है। फिर चाहे वे चुनाव जीते हों या हारे हों। युवा और नए कार्यकर्ताओं को आखिर कार्यकारिणी की पहली सूची में मौका क्यों नहीं दिया गया..? जब चुनिंदा नेताओं को ही टिकिट और पद दोनों दिए जाएंगे तो क्या पार्टी के काबिल युवा नेता, कार्यकर्ता पार्टी के झंडे-डंडे ही उठाते रहेंगे..? पार्टी हाईकमान की तरह मध्यप्रदेश में कांग्रेस ग्रास रूट लेबल पर नई लीडरशिप को आखिर कब मौका देगी..? कब तक चुनिंदा नेताओं की सिफारिश पर पद और टिकिट की बंदरबांट की जाती रहेगी..? फुके हुए कारतूस कब तक बार-बार बारूद भरकर चलाए जाते रहेंगे..? प्रदेश के आम मतदाताओं द्वारा नकारे जा रहे नेताओं को कार्यकर्ता आखिर कब तक झेले..?

किसे गुमराह कर रही कांग्रेस..?:-

पिछले करीब 20 सालों से मध्यप्रदेश की सत्ता से बाहर कांग्रेस बार-बार वो ही गलतियां दोहरा रही है जो पूर्व में भी पार्टी के पतन का कारण बनी। गुटबाजी, चाटुकारिता और पट्ठावाद के कारण पिछले 20 वर्षों से कांग्रेस हर चुनाव में सत्ताधारी पार्टी से मुंह की खाती है, इसके बावजूद संभलने का नाम नहीं लेती। आखिर सच्चाई से मुंह मोड़कर प्रदेश कांग्रेस मध्यप्रदेश में किसे गुमराह कर रही हैं ? पार्टी हाईकमान को ? पार्टी के ईमानदार, निष्ठावान जमीनी कार्यकर्ताओं को ? खुद को ? या प्रदेश की करीब साढ़े 8 करोड़ जनता को ?

जानकारी जुटाने की हिम्मत कर पाएंगे:-

चंद नेताओं की पर्ची पर कांग्रेस द्वारा कार्यकारिणी की पहली सूची तो जारी कर दी गई, लेकिन पार्टी के मुखिया जी ने क्या ये देखा कि पहली सूची के इन पदाधिकारियों में से कितने नेताओं की ग्राम पंचायत में कांग्रेस समर्थित सरपंच, जनपद सदस्य और नगरीय निकायों में पार्टी के वार्ड पार्षद हैं..? क्या मुखिया जी पर्चियों के आधार पर घोषित पहली सूची के प्रदेश पदाधिकारियों से ये जानकारी जुटाने की हिम्मत कर पाएंगे..? क्या वे इन पदाधिकारियों से ये जानकारी मांग पाएंगे कि इनके गांव, जनपद क्षेत्र और नगरीय वार्ड से कांग्रेस के पार्षद, विधानसभा और लोकसभा प्रत्याशी पिछले 3 चुनावों में कितने वोटों से हारे या जीते हैं ? पदाधिकारियों से इतनी जानकारी मांगने पर उन्हें अपनी पहली सूची में नवगठित कार्यकारिणी की हकीकत पता चल जाएगी ? इन सभी सवालों की निष्पक्ष जांच तभी संभव है जब पर्ची लिफाफे में न आई हो। जो नवनियुक्त पदाधिकारी पिछले 3 चुनावों यानि 10 से 15 सालों में अपने गांव, वार्ड में पार्टी प्रत्याशियों को नहीं जिता पाएं हो, क्षेत्र में उनके जनाधार का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। जो नेता खुद कभी एक भी विधानसभा का चुनाव नहीं जीत पाएं हो या अपने गृह क्षेत्र/वार्ड से पार्टी के किसी भी प्रत्याशी को नहीं जिता पाएं हो, ऐसे पदाधिकारियों के भरोसे 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी करना पार्टी के जमीनी, ईमानदार, निष्ठावान कार्यकर्ताओं और प्रदेश के करोड़ों मतदाताओं के साथ मजाक नहीं तो और क्या है..?